ध्वनि संबंधी न्यूरोमा, जिसे वेस्टिबुलर श्वानोमा या न्यूरिलेमोमा भी कहा जाता है, वेस्टिबुलोकोकलियर नस का एक गैर-कैंसरयुक्त ट्यूमर है। यह नस अंदर के कान को दिमाग से जोड़ती है और इसके दो भाग होते हैं: एक भाग आवाज़ को प्रसारित करता है, और दूसरा भाग अंदर के कान से दिमाग तक संतुलन से जुड़ी जानकारी को भेजने में मदद करता है।
ध्वनि संबंधी (अकूस्टिक) न्यूरोमा आमतौर पर धीरे-धीरे बढ़ते हैं। हालाँकि वे सीधे तौर पर दिमाग को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, लेकिन जैसे-जैसे वे बढ़ते हैं, वे उस पर दबाव डाल सकते हैं। बड़े ट्यूमर आस-पास की कपाल की नसों पर दबाव डाल सकते हैं जो चेहरे की मांसपेशियों और संवेदना को नियंत्रित करती हैं। यदि ट्यूमर इतना बड़ा हो जाए कि ब्रेन स्टेम या सेरिबैलम पर दबाव डाल सके, तो वे जानलेवा हो सकते हैं।
लक्षण
ध्वनि संबंधी (अकूस्टिक) न्यूरोमा के शुरुआती सिमटम अक्सर सूक्ष्म होते हैं और उन्हें उम्र से जुड़े बदलाव की तरह समझने की भूल हो सकती है, जिससे डायग्नोसिस में देरी हो सकती है। शुरुआती सिमटम में टिनिटस (कान में घंटियाँ बजना/भिनभिनाहट) के साथ एक कान से धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम होने लगती है। शायद ही कभी, ध्वनि संबंधी (अकूस्टिक) न्यूरोमा अचानक और ऐसे कारणों से सुनाई देना बंद हो सकता है जिन्हें समझाया नहीं जा सकता है। दूसरे सिमटम में निम्न शामिल हो सकते हैं:
चेहरा सुन्न पड़ जाना या रुक-रुक कर झुनझुनी महसूस होना
वर्टिगो (अक्सर सिर घूमने के बजाय असंतुलन)
संतुलन डिसोर्डर
चेहरे की कमजोरी
स्वाद में बदलाव
निगलने में परेशानी
आवाज का भारी होना
जानने-समझने की क्रिया से जुड़ी गड़बड़ी
लगातार यह सिमटम दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए।
जांच
वेस्टिबुलर इवैल्यूएशन: वीडियोनिस्टाग्मोग्राफी (VNG) एक अहम डायग्नोसिस उपकरण है।
ऑडियोमेट्री: दोनों कानों से कितना तेज़ सुनाई देता है इसका आकलन करने के लिए उपयोग किया जाता है।
इमेजिंग: कंट्रास्ट के साथ दिमाग का MRI करने पर ध्वनि संबंधी न्यूरोमा है या नहीं इसकी पुष्टि की जाती है।
ध्वनि संबंधी न्यूरोमा के लिए तीन प्राथमिक ट्रीटमेंट के तरीके हैं:
अब्ज़रवेशन: ध्वनि संबंधी न्यूरोमा गैर-कैंसरयुक्त होते हैं और आमतौर पर धीमी गति से बढ़ते हैं। डॉक्टर समय-समय पर MRI स्कैन के साथ ट्यूमर की निगरानी कर सकते हैं और अगर यह तेजी से बढ़ता है या सिमटम बिगड़ते हैं तो और ज़्यादा आक्रामक ट्रीटमेंट की सलाह दे सकते हैं।
सर्जरी: सर्जरी में पूरे ट्यूमर या उसके कुछ हिस्से को हटाया जा सकता है। सर्जरी से जुड़े तीन मुख्य अप्रोच हैं:
a. ट्रांसलेबिरिन्थिन अप्रोच:
इसमें कान के पीछे चीरा लगाकर कान के पीछे और कान के बीच की हड्डी को हटाया जाता है।
इसे 3 सेंटीमीटर से बड़े ट्यूमर के लिए रेकमेंड किया जाता है।
लाभ: ट्यूमर हटाने से पहले सर्जन चेहरे की नस को ठीक से देख पाते हैं।
नुकसान: इसके कारण सुनने की क्षमता हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।
b.रेट्रोसिग्मॉइड/सबओसीपिटल अप्रोच:
इसमें ट्यूमर को देखने के लिए सिर के पीछे के हिस्से पर कपाल को खोला जाता है।
इसका उपयोग किसी भी आकार के ट्यूमर के लिए किया जा सकता है और इसमें सुनने की क्षमता के बने रहने की संभावना होती है।
c.मिडल फोसा अप्रोच:
इसमें ऑडिटरी कनाल तक सीमित छोटे ट्यूमर तक पहुंचने और उनको हटाने के लिए कान के कनाल से हड्डी का एक छोटा सा टुकड़ा निकाला जाता है।
इसमें सुनने की क्षमता सुरक्षित रखी जाती है।
पूरा एंडोस्कोपिक विभाजन
यह एक नया और कम चीर-फाड़ वाला तकनीक है जिसमें कपाल में एक छेद करके एक छोटा सा कैमरा डाला जाता है।
उच्च प्रशिक्षित सर्जनों द्वारा केवल चुनिंदा चिकित्सा केंद्रों में ही यह किया जाता है।
शुरुआती अध्ययन से पता चलता है की पारंपरिक सर्जरी की तुलना में इसकी सफलता का दर अच्छा है।
रेडीएशन थेरेपी
ध्वनि संबंधी न्यूरोमा वाले कुछ रोगियों के लिए रेकेमंड किया जाता है।
आधुनिक तकनीकों से आसपास के टिशू से संपर्क को सीमित करते हुए ट्यूमर को रेडीएशन की हाइ डोज़ दी जाती है।
दो तरीके ज़्यादा स्वीकार किए जाते हैं:
स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी (SRS):
एक ही सेशन में ट्यूमर तक रेडीएशन की कई छोटी किरणें पहुंचाई जाती हैं।
फ्रैक्शनेटेड स्टीरियोटैक्टिक रेडियोथेरेपी (FSR):
इसमें कई हफ्तों तक रेडएशन की कम डोज़ दी जाती है।
अध्ययनों से पता चलता है कि इस तरीके में SRS की तुलना में सुनने की क्षमता को बेहतर रखा जा सकता है।
इन ट्रीटमेंट विकल्पों का उद्देश्य सिमटम को मैनेज करना, ट्यूमर के विकास को नियंत्रित करना और रोगी के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है।
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